लापरवाही से हुई क्षति पर अब जवाबदेही और मुआवजे का हो स्पष्ट कानून: डॉ. राजेश्वर सिंह

There should now be a clear law regarding accountability and compensation for damage caused due to negligence: Dr. Rajeshwar Singh

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Lucknow, 19 Sep, 2026 10:49 PM
लापरवाही से हुई क्षति पर अब जवाबदेही और मुआवजे का हो स्पष्ट कानून: डॉ. राजेश्वर सिंह

केंद्रीय विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ लाने की मांग, बोले- जहां क्षति हुई है, वहां समाधान का अधिकार भी होना चाहिए

लखनऊ, 19 सितम्बर 2026 (आईपीएन)। सरोजनीनगर के विधायक डॉ. राजेश्वर सिंह ने नागरिकों को लापरवाही, प्रशासनिक चूक और अन्य सिविल रॉन्ग्स से होने वाली क्षति की स्थिति में प्रभावी और समयबद्ध क्षतिपूर्ति का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक व्यापक कानून बनाए जाने की पहल की है। उन्होंने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ लाने का आग्रह किया है।

डॉ. सिंह का प्रस्ताव ऐसे समय में सामने आया है जब सड़क दुर्घटनाओं, चिकित्सा लापरवाही, खराब सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, औद्योगिक दुर्घटनाओं, साइबर फ्रॉड, डेटा ब्रीच और डिजिटल तकनीक से जुड़ी नई तरह की क्षतियों के मामलों में पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति की प्रक्रिया कई स्तरों पर जटिल बनी हुई है। प्रस्तावित संहिता के माध्यम से नागरिकों के लिए यह स्पष्ट करने पर जोर दिया गया है कि नुकसान होने की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी, दावा कहां किया जाएगा और पीड़ित को समयबद्ध राहत कैसे मिलेगी।

‘दंड देना ही पर्याप्त नहीं, पीड़ित का जीवन भी यथासंभव पुनर्स्थापित हो’

डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने पत्र में कहा है कि भारत ने औपनिवेशिक दौर के आपराधिक कानूनों को आधुनिक स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अब नागरिक क्षति और उसकी भरपाई से जुड़े कानूनों को भी आधुनिक बनाने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि दोषी को दंड देना न्याय का एक पक्ष है, लेकिन जिस नागरिक को नुकसान हुआ है, उसके जीवन को यथासंभव सामान्य स्थिति में वापस लाना भी न्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।

डॉ. सिंह के अनुसार, “भारत ने दंड देने वाले कानून को आधुनिक बनाया है। अब समय है कि क्षति की भरपाई करने वाले कानून को भी आधुनिक बनाया जाए।”

सात दशक पहले उठी थी व्यापक कानून की जरूरत

डॉ. राजेश्वर सिंह ने अपने प्रस्ताव में इस बात की ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि भारत में सिविल रॉन्ग्स और राज्य के दायित्व से संबंधित व्यापक कानून की आवश्यकता कोई नई मांग नहीं है।

प्रथम विधि आयोग ने वर्ष 1956 में ही राज्य की दायित्व-निर्धारण व्यवस्था के लिए कानून बनाए जाने की सिफारिश की थी। इसके बाद वर्ष 1965 और 1967 में इस दिशा में विधेयक भी पेश किए गए, लेकिन वे कानून का रूप नहीं ले सके।

नतीजतन आज भी भारत में सिविल रॉन्ग्स से संबंधित कोई एक व्यापक और समग्र कानून मौजूद नहीं है। गलत तरीके से हुई मृत्यु से संबंधित क्षतिपूर्ति दावों के लिए आज भी औपनिवेशिक काल में बनाए गए Fatal Accidents Act, 1855 का सहारा लिया जाता है।

डॉ. सिंह ने इसी लंबे समय से लंबित विधायी सुधार को आधुनिक संदर्भों के अनुरूप आगे बढ़ाने की आवश्यकता जताई है।

गड्ढे, खुले नाले से लेकर डेटा ब्रीच और डीपफेक तक दायरा

प्रस्तावित ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एवं क्षतिपूर्ति संहिता’ का दायरा केवल पारंपरिक दुर्घटनाओं तक सीमित नहीं रखने का सुझाव दिया गया है। इसमें बदलती तकनीक और आधुनिक जीवन से पैदा होने वाली नई प्रकार की नागरिक क्षतियों को भी शामिल किया जा सकता है।

डॉ. सिंह ने चिकित्सा लापरवाही, खराब सड़क, खुले नाले, खराब भवन डिजाइन, औद्योगिक दुर्घटनाओं, साइबर फ्रॉड, डेटा ब्रीच, डीपफेक और पुलिस की ज्यादती जैसे मामलों में स्पष्ट जवाबदेही और क्षतिपूर्ति व्यवस्था की आवश्यकता बताई है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी नागरिक को सार्वजनिक व्यवस्था की कमी, लापरवाही या किसी संस्था की गलती के कारण नुकसान होता है तो उसके पास प्रभावी कानूनी उपाय होना चाहिए।

सड़क हादसों के आंकड़े बताते हैं समस्या की गंभीरता

डॉ. सिंह ने वर्ष 2023 के सड़क दुर्घटना आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि देश में उस वर्ष 4.8 लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाएं और करीब 1.72 लाख मौतें दर्ज की गईं। ऐसे मामलों में दुर्घटना के कारण और जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ पीड़ित परिवार को उचित एवं समयबद्ध क्षतिपूर्ति दिलाने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।

गड्ढों, खुले नालों, खराब सड़क डिजाइन या अन्य सार्वजनिक अवसंरचना संबंधी लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं में सड़क एजेंसियों और ठेकेदारों की जवाबदेही तय करने के लिए भी स्पष्ट कानूनी ढांचे की जरूरत बताई गई है।

साइबर युग में क्षतिपूर्ति कानून की नई जरूरत

डॉ. सिंह ने साइबर अपराध और डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़े नुकसान को भी प्रस्तावित कानून के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल करने की बात कही है।

उनके अनुसार, नवंबर 2025 तक साइबर फ्रॉड में लगभग ₹20,000 करोड़ की राशि के नुकसान की बात सामने आई थी, जबकि लगभग ₹8,000 करोड़ की राशि बचाने या फ्रीज करने में सफलता मिली। ऐसे मामलों में केवल अपराधी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि पीड़ित को हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए भी स्पष्ट कानूनी व्यवस्था आवश्यक है।

इसी तरह डेटा ब्रीच के मामलों में व्यक्तिगत जानकारी या डिजिटल डेटा प्रभावित होने वाले नागरिकों के लिए भी वैधानिक क्षतिपूर्ति अधिकार को स्पष्ट किए जाने का प्रस्ताव है।

नागरिक को पांच सवालों का मिलेगा स्पष्ट जवाब

डॉ. राजेश्वर सिंह ने प्रस्तावित संहिता को नागरिक-केंद्रित बनाने पर विशेष जोर दिया है। उनके अनुसार कानून ऐसा होना चाहिए जिससे आम नागरिक को किसी क्षति की स्थिति में पांच बुनियादी सवालों के स्पष्ट उत्तर मिल सकें—

किसके खिलाफ दावा किया जा सकता है?
दावा कहां किया जाएगा?
कितने समय के भीतर दावा किया जा सकता है?
कितनी क्षतिपूर्ति मांगी जा सकती है?
अंतिम निर्णय आने तक अंतरिम राहत क्या मिल सकती है?

इन सवालों का स्पष्ट वैधानिक समाधान होने से नागरिकों के लिए न्यायिक प्रक्रिया को अधिक समझने योग्य और सुलभ बनाया जा सकता है।

प्रशासनिक जवाबदेही को भी कानून के दायरे में लाने का सुझाव

डॉ. सिंह ने सरकारी विभागों की जवाबदेही से संबंधित प्रावधानों का भी सुझाव दिया है। प्रस्ताव के अनुसार, क्षतिपूर्ति दावों पर संबंधित विभागों को निर्धारित समयसीमा में जवाब देना अनिवार्य किया जा सकता है।

साथ ही ईमानदारी और सद्भावना से निर्णय लेने वाले अधिकारियों को आवश्यक कानूनी संरक्षण दिया जा सकता है, ताकि प्रशासनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित न हो। दूसरी ओर, दुर्भावना अथवा घोर लापरवाही सिद्ध होने की स्थिति में संबंधित अधिकारी से क्षतिपूर्ति की वसूली की व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है।

डॉ. सिंह ने इस व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट के LDA v. M.K. Gupta जैसे स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप विकसित किए जाने की संभावना जताई है।

विभागों के लिए वार्षिक क्षतिपूर्ति डेटा सार्वजनिक करने का सुझाव

प्रस्ताव में सरकारी विभागों द्वारा प्राप्त और निस्तारित क्षतिपूर्ति दावों का वार्षिक डेटा प्रकाशित करने की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।

इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी विभाग या व्यवस्था में किस प्रकार की कमियां बार-बार सामने आ रही हैं। ऐसे आंकड़ों के आधार पर प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार के लिए नीतिगत कदम उठाए जा सकते हैं।

झूठे दावों पर रोक, ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण

डॉ. सिंह ने प्रस्तावित कानून में संतुलित सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पर भी जोर दिया है। झूठे और निराधार दावों को रोकने के लिए प्रावधान होने चाहिए, वहीं सद्भावना से किए गए सरकारी निर्णयों के लिए अधिकारियों को अनावश्यक मुकदमेबाजी से संरक्षण मिलना चाहिए।

इसके साथ ही नागरिकों को महंगी और लंबी मुकदमेबाजी से बचाने के लिए किफायती ऑनलाइन समाधान व्यवस्था और मुकदमे से पहले मध्यस्थता जैसे विकल्प विकसित किए जाने का सुझाव दिया गया है।

भारतीय विधि आयोग से समयबद्ध रिपोर्ट की मांग

डॉ. राजेश्वर सिंह ने केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री से आग्रह किया है कि इस विषय को भारतीय विधि आयोग के पास भेजा जाए और उससे समयबद्ध रिपोर्ट प्राप्त की जाए। इसके बाद विशेषज्ञ समिति गठित कर विभिन्न पक्षों से व्यापक राष्ट्रीय परामर्श की प्रक्रिया शुरू करने का भी सुझाव दिया गया है।

उनका कहना है कि बदलती अर्थव्यवस्था, तकनीक और नागरिक जीवन की नई परिस्थितियों को देखते हुए भारत को ऐसा नागरिक क्षतिपूर्ति कानून चाहिए जो पीड़ित व्यक्ति के अधिकारों को स्पष्ट करे और जवाबदेही की प्रक्रिया को प्रभावी बनाए।

डॉ. राजेश्वर सिंह ने कहा, “जहां क्षति हुई है, वहां न्याय का अर्थ केवल निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि पीड़ित को यथासंभव पुनर्स्थापित करना भी होना चाहिए।”

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