खेत में श्रम सबसे ज्यादा, अधिकार सबसे कम, भूमिहीन किसान महिलाओं की स्थिति पर शोध रिपोर्ट ने उठाए सवाल

The most labor in the fields, the least rights, research report raises questions on the condition of landless farmer women

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Lucknow, 12 Sep, 2026 08:28 AM
खेत में श्रम सबसे ज्यादा, अधिकार सबसे कम, भूमिहीन किसान महिलाओं की स्थिति पर शोध रिपोर्ट ने उठाए सवाल

अनुसूचित जाति की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ गठित करने की मांग

लखनऊ, 11 सितम्बर 2026 (आईपीएन)। उत्तर प्रदेश की भूमिहीन किसान और महिला श्रमिकों का पसीना खेतों को हरा-भरा रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन भूमि स्वामित्व, मजदूरी और निर्णय लेने के अधिकारों में उनकी हिस्सेदारी अब भी बेहद कम है। भूमिहीन महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर सामाजिक समरसता मंच, अवध प्रान्त की ओर से शुक्रवार को विश्व संवाद केन्द्र, जियामऊ, लखनऊ में आयोजित प्रेसवार्ता में एक शोध-प्रतिवेदन जारी किया गया।

यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय की राजनीति शास्त्र की प्रोफेसर डॉ. चंद्रकांता के. माथुर ने सामाजिक समरसता गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक के. श्याम प्रसाद के मार्गदर्शन में किया है। शोध में प्रदेश की भूमिहीन किसान महिलाओं के श्रम, भूमि अधिकार, मजदूरी, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक स्थिति से जुड़े विभिन्न पहलुओं को सामने रखा गया है।

भूमिहीन महिलाओं को ‘अन्नदाता’ के रूप में मिले पहचान

शोधकर्ता डॉ. चंद्रकांता के. माथुर ने कहा कि जब तक भूमिहीन किसान महिला को ‘अन्नदाता’ के रूप में मान्यता देने के साथ भूमि, मजदूरी और निर्णय प्रक्रिया में उसका उचित अधिकार नहीं मिलता, तब तक ग्रामीण भारत का सशक्तिकरण अधूरा रहेगा।

उन्होंने कहा कि नए भारत की कल्पना तभी पूरी होगी, जब खेत की मेड़ पर खड़ी वह महिला, जिसके नाम एक इंच जमीन भी नहीं है, उतने ही आत्मविश्वास के साथ नीति-निर्धारण की मेज पर अपनी बात रख सके।

भूमि स्वामित्व और मजदूरी की स्थिति चिंताजनक

शोध-प्रतिवेदन में दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश में केवल 7.6 प्रतिशत महिलाओं के नाम कृषि भूमि दर्ज है। बड़ी संख्या में महिलाएं परिवार की जमीन पर काम करने के बावजूद भूमि की वास्तविक मालिक नहीं हैं।

प्रतिवेदन के अनुसार प्रदेश की 85 प्रतिशत महिला श्रमशक्ति खेतों में कार्य करती है, लेकिन इनमें से अधिकांश के श्रम को अवैतनिक माना जाता है। पिछले एक वर्ष में काम करने वाली महिलाओं में 18 प्रतिशत से कम को ही नकद मजदूरी मिल सकी, जबकि बड़ी संख्या में महिलाओं को अनाज या अन्य वस्तुओं के रूप में पारिश्रमिक मिला।

रिपोर्ट में मध्य, पूर्वी और दक्षिणी उत्तर प्रदेश के भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों में निर्धनता की दर 73.4 प्रतिशत से 89.8 प्रतिशत तक होने का दावा किया गया है। इसमें बुंदेलखंड और अनुसूचित जाति समुदाय की महिलाएं विशेष रूप से प्रभावित बताई गई हैं।

स्वास्थ्य और शिक्षा के मोर्चे पर भी गंभीर चुनौती

शोध-प्रतिवेदन में महिला साक्षरता दर पुरुषों की तुलना में कम होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार महिला साक्षरता लगभग 66 प्रतिशत, जबकि पुरुष साक्षरता 82 प्रतिशत है।

इसके साथ ही बड़ी संख्या में महिलाओं में एनीमिया और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में कुपोषण की समस्या का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक केवल 16 प्रतिशत भूमिहीन परिवारों के पास स्वास्थ्य बीमा की सुविधा उपलब्ध है।

भूमिहीन महिला श्रमिकों के लिए बने विशेष योजनाएं

डॉ. चंद्रकांता के. माथुर ने सरकार से भूमिहीन महिला श्रमिकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अलग और लक्षित योजनाएं बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि महिला श्रमिकों को केवल श्रमशक्ति के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखा जाना चाहिए।

अनुसूचित जाति की भूमिहीन महिलाओं के लिए अलग प्रकोष्ठ की मांग

सामाजिक समरसता गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक के. श्याम प्रसाद ने कहा कि किसान परिवार की महिला हो या भूमिहीन खेत मजदूर परिवार की महिला, दोनों एक ही खेत, एक ही परिश्रम और एक ही सपने की साझेदार हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण भारत की इन दोनों महिला शक्तियों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि सहयात्री मानकर आगे बढ़ना होगा।

उन्होंने अनुसूचित जाति एवं अन्य वंचित वर्गों की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ गठित किए जाने की मांग की। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता का अर्थ यही है कि गांव की हर महिला, चाहे वह भूमि की मालकिन हो या भूमिहीन खेत मजदूर, एक-दूसरे को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहयात्री माने।

सरकार के सामने रखीं प्रमुख मांगें

शोध-प्रतिवेदन के माध्यम से सरकार और समाज के सामने कई प्रमुख मांगें रखी गईं। इनमें अनुसूचित जाति एवं वंचित वर्गों की भूमिहीन महिलाओं के लिए पृथक कल्याणकारी प्रकोष्ठ का गठन, मनरेगा के तहत भूमिहीन महिला श्रमिकों को प्राथमिकता के आधार पर वर्षभर रोजगार उपलब्ध कराना, समान काम के बदले समान मजदूरी तथा तत्काल नकद भुगतान सुनिश्चित करना शामिल है।

इसके अलावा ‘खेतमजदूर कार्ड’ के माध्यम से महिला श्रमिकों की पहचान कर उन्हें प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) से जोड़ने तथा भूमिहीन किसानों को बिना भूमि गिरवी रखे विशेष ऋण और बीमा सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग भी की गई।

मंच ने कहा कि यह विषय किसी एक विभाग या योजना तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार, प्रशासन और समाज सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। सरकार को भूमिहीन महिला श्रमिकों के लिए प्रभावी नीति बनानी होगी और प्रशासन को उसका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुंचाना होगा।

प्रेसवार्ता में सामाजिक समरसता गतिविधि के प्रान्त प्रमुख राजकिशोर, शोध सहयोगी अविशा रवि तथा सामाजिक समरसता गतिविधि की प्रान्तीय टोली के सदस्य बृजनन्दन राजू प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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