जलवायु परिवर्तन से खतरे में पड़ सकता है द्वीपों का अस्तित्व, विकास की परिभाषा बदलने की जरूरत : डॉ. दिनेश शर्मा
Climate change could endanger the existence of islands, the definition of development needs to be changed: Dr. Dinesh Sharma
IPN Live
Lucknow, 6 Nov, 2026 03:05 AMअंडमान-निकोबार को बताया भारत का सामरिक सुरक्षा प्रहरी, प्रकृति संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने पर दिया जोर
लखनऊ/श्रीविजयपुरम, 6 नवंबर 2026 (आईपीएन)। अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के उपराज्यपाल और उत्तर प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन आने वाले समय में द्वीप समूहों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। बढ़ता तापमान, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और चक्रवातों की तीव्रता इस संकट को लगातार गहरा रही है। विशेष रूप से समुद्र तल से कम ऊंचाई पर स्थित द्वीपों के संरक्षण के लिए प्रभावी और विशेष कार्ययोजना तैयार करने की जरूरत है।
‘जलवायु परिवर्तन के दौर में द्वीपों का भविष्य : अंडमान-निकोबार के संदर्भ में’ विषय पर आयोजित सेमिनार में डॉ. शर्मा ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में विकास की अवधारणा को फिर से परिभाषित करना होगा। ऐसा विकास जरूरी है, जिसमें प्रकृति का संरक्षण और आर्थिक प्रगति साथ-साथ चलें। अंडमान-निकोबार केवल भारत के सामरिक सुरक्षा प्रहरी ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी अहसास कराते हैं। समुद्र की लहरों से विनाश नहीं, बल्कि जीवन का संदेश निकलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह द्वीप समूहों के सामाजिक जीवन, परंपराओं और स्थानीय समुदायों को भी प्रभावित कर रहा है। मानव सभ्यता प्रकृति के साथ संघर्ष करके नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल स्थापित करके ही सुरक्षित रह सकती है। इसी सोच के साथ अंडमान में प्रकृति संरक्षण के साथ प्रगति के मंत्र को अपनाया गया है।
समुद्र का बढ़ता जलस्तर पेयजल और आजीविका के लिए चुनौती
डॉ. शर्मा ने कहा कि अंडमान-निकोबार अपनी प्राकृतिक संपदा, सामरिक महत्व और सांस्कृतिक विविधता के कारण देश के लिए विशेष महत्व रखता है। यहां के तटीय क्षेत्रों और स्थानीय निवासियों का समुद्र के साथ गहरा संबंध है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर न केवल भूमि को प्रभावित कर सकता है, बल्कि पेयजल, कृषि और मत्स्य पालन के सामने भी गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
उन्होंने कहा कि इस संकट से निपटने के लिए प्राकृतिक सुरक्षा कवच के रूप में मौजूद वनों और प्रवाल भित्तियों का संरक्षण बेहद जरूरी है। ये प्राकृतिक संरचनाएं समुद्री लहरों और चक्रवातों के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के साथ स्वच्छ ऊर्जा के इस्तेमाल और वर्षा जल संचयन की प्रभावी व्यवस्था पर भी विशेष ध्यान देना होगा।
जनजातीय समाज के अनुभव बन सकते हैं संकट से निपटने का आधार
उपराज्यपाल ने कहा कि स्थानीय और जनजातीय समाज के पारंपरिक अनुभव जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। उनके प्रकृति आधारित जीवन और पारंपरिक ज्ञान को विकास की योजनाओं में उचित स्थान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने अंडमान-निकोबार के भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि आने वाले समय में यह द्वीप समूह समुद्री मार्ग से होने वाले व्यापार का बड़ा केंद्र बन सकता है। यहां होने वाला विकास भारत की आर्थिक समृद्धि को गति देने के साथ देश की सामरिक शक्ति को भी मजबूती प्रदान करेगा।
वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों की रही मौजूदगी
सेमिनार में प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. सी.एम. नौटियाल, डॉ. मुकुंद शर्मा, डॉ. ध्रुवसेन सिंह, डॉ. आत्मप्रकाश मिश्र, डॉ. वेंकटेश दत्ता, प्रो. कंचनलता, प्रो. शालिनी श्रीवास्तव, पार्षद स्वदेश सिंह और प्रो. पूनम वर्मा सहित अनेक विशेषज्ञ एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
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