राज्यपाल ने लखनऊ में किया 86वां AIPOC का उद्घाटन, पीठासीन अधिकारियों को बताया लोकतंत्र की आत्मा का संरक्षक
Governor inaugurates 86th AIPOC in Lucknow, calls presiding officers guardians of the soul of democracy
IPN Live
Lucknow, 21 Jan, 2026 01:58 AMलखनऊ, (आईपीएन)। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने सोमवार को विधानसभा, लखनऊ में 19 से 21 जनवरी, 2026 तक आयोजित अखिल भारतीय 86वें पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों से पधारे विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों, गणमान्य अतिथियों एवं जनप्रतिनिधियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया।
राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस महत्वपूर्ण सम्मेलन का आयोजन होना अत्यंत गौरव का विषय है। यह सम्मेलन भारतीय संसदीय परंपराओं की सुदृढ़ता, मर्यादा और निरंतरता का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि लखनऊ की तहज़ीब, संवाद और समन्वय की परंपरा इस सम्मेलन को विशेष गरिमा प्रदान करती है।
राज्यपाल ने पीठासीन अधिकारियों को लोकतंत्र की आत्मा का संरक्षक बताते हुए कहा कि उनकी निष्पक्षता, विवेक और मर्यादा ही सदनों को जनआकांक्षाओं की प्रभावी अभिव्यक्ति का मंच बनाती है। यह सम्मेलन अनुभवों के आदान-प्रदान, श्रेष्ठ संसदीय परंपराओं के संरक्षण और नवाचारों के सृजन का सशक्त माध्यम बने, यही कामना है।
राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और लोकतांत्रिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रदेश वैदिक संस्कृति, दर्शन और लोकतांत्रिक चेतना का जीवंत केंद्र रहा है। प्रयागराज, अयोध्या, वाराणसी और मथुरा जैसी पावन धरा ने भारत की आत्मा और मूल्यों को दिशा दी है।
उन्होंने कहा कि विधानमंडल जनआकांक्षाओं को स्वर देने का पवित्र मंच है और सदन की सार्थकता केवल बहसों की संख्या से नहीं, बल्कि लोककल्याण के प्रति दृष्टिकोण, तथ्यपूर्ण एवं समाधानपरक चर्चा से निर्धारित होती है। यदि संवाद समाधान में परिवर्तित हो, तभी संसदीय लोकतंत्र सशक्त और विश्वासयोग्य बनता है।
राज्यपाल ने सदन की कार्यवाहियों में व्यवधान को एक गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि इससे जनहित के महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा बाधित होती है और लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास प्रभावित होता है। उन्होंने विचारों की भिन्नता को लोकतंत्र की शक्ति बताते हुए असहमति को लोकतांत्रिक सौंदर्य के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया।
राज्यपाल ने अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधानसभा सतीश महाना के मार्गदर्शन में प्रकाशित पुस्तक ‘उत्तर प्रदेश विधान सभा की संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रकाशन लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संसदीय अनुशासन का महत्वपूर्ण पथ प्रदर्शक सिद्ध होगा।
राज्यपाल ने विश्वास व्यक्त किया कि इस सम्मेलन में गहन, संतुलित और सार्थक विचार-विमर्श होगा तथा यह आयोजन संसदीय प्रणाली को और अधिक सशक्त, संवेदनशील और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के सम्मेलन राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के साथ-साथ भारत के संसदीय लोकतंत्र को नई दिशा प्रदान करते हैं।
राज्यपाल ने सभी प्रतिभागियों का उत्तर प्रदेश की धरती पर स्वागत करते हुए आशा व्यक्त की कि यह सम्मेलन लोकतंत्र को और अधिक सशक्त, समावेशी और जनोन्मुखी बनाने की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होगा।
राज्यपाल ने कहा कि हमारे लोकसभा अध्यक्ष ने संसद एवं विधानसभाओं के संचालन को लेकर यह महत्वपूर्ण सुझाव दिया है कि उनकी समय-सीमा निश्चित होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब विधानसभाएँ चार, पाँच या दस दिनों तक चलती हैं, तब भी कई बार विधायकों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता।
राज्यपाल ने कहा कि जब हमारे लोकसभा अध्यक्ष इस दिशा में पहल करने का आह्वान करते हैं, तो यह हम सभी का दायित्व बनता है कि हम उस पर गंभीरता से अमल करें। उन्होंने अपेक्षा व्यक्त की कि सम्मेलन के दो-तीन दिन में इस विषय पर ठोस निर्णय लिया जाएगा, ताकि विधायी कार्य अधिक प्रभावी, सुव्यवस्थित और जनहितकारी बन सके।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उत्तर प्रदेश में आयोजित पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश की धरती आध्यात्मिक संस्कृति, स्वतंत्रता संग्राम, सांस्कृतिक चेतना और राजनीतिक ऊर्जा की भूमि रही है। उन्होंने कहा कि देश का सबसे बड़ा प्रदेश होने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश ने आज़ादी के आंदोलन में भी अग्रणी भूमिका निभाई है तथा यहां आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक चेतना के साथ नई राजनीतिक ऊर्जा का भी संचार होता है।
श्री बिरला ने कहा कि इस सम्मेलन में देश के विभिन्न राज्यों के विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारी एवं संरक्षक उपस्थित हैं, जिनकी जिम्मेदारी विधानमंडलों की गरिमा, विशिष्टता और प्रभावशीलता को बनाए रखने की है। जिस धरती पर यह सम्मेलन हो रहा है, वहां से सभी प्रतिनिधि नई ऊर्जा लेकर लौटें, यह सम्मेलन का उद्देश्य है।
उन्होंने कहा कि आने वाले समय में लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा, मर्यादा और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए विस्तृत और गंभीर विचार-विमर्श आवश्यक है। उन्होंने स्मरण कराया कि वर्ष 2015 में इसी विधानसभा में आयोजित पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में विधानसभाओं में प्रौद्योगिकी के उपयोग, पेपरलेस विधानसभाओं और कार्यवाहियों को जनता तक पहुंचाने पर चर्चा हुई थी।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि वर्ष 2026 में आज स्थिति यह है कि देश की अधिकांश विधानसभाएं पेपरलेस हो चुकी हैं, विधानमंडलों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण हो रहा है तथा नवीन नवाचारों के माध्यम से विधानसभाओं का डिजिटलीकरण भी किया जा चुका है। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यवाही जनता तक पहुंची है और पारदर्शिता बढ़ी है।
श्री बिरला ने यह भी कहा कि इन उपलब्धियों के बावजूद कई चुनौतियां अभी शेष हैं, जिनका समाधान सभी को मिलकर करना होगा। राजनीतिक विधानसभाओं को जनता की विशिष्ट और प्रामाणिक आवाज़ बनाए रखना हम सभी की सबसे बड़ी नैतिक जिम्मेदारी है चाहे वह पीठासीन अधिकारी हों या जनप्रतिनिधि।
उन्होंने कहा कि यद्यपि जनप्रतिनिधि विभिन्न राजनीतिक दलों और विचारधाराओं से निर्वाचित होकर आते हैं, लेकिन सदन में जनता की अपेक्षाओं, आकांक्षाओं, चुनौतियों और कठिनाइयों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की वास्तविक विशेषता है।
उपसभापति राज्यसभा हरिवंश ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश देश का हृदय प्रदेश है। यह भूमि इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और अध्यात्म की पावन धरती रही है। काशी, प्रयागराज, अयोध्या, नैमिषारण्य, चित्रकूट एवं सारनाथ जैसी पवित्र स्थलों ने भारत की सांस्कृतिक चेतना को सदैव दिशा प्रदान की है।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के गौरवशाली स्वरूप को दर्शाने वाले एक संदेश में “यू.पी. नहीं देखा तो इंडिया नहीं देखा” जैसा प्रभावशाली स्लोगन देखने को मिला, जो प्रदेश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता को सार्थक रूप से प्रतिबिंबित करता है।
उपसभापति ने कहा कि राज्यपाल का लंबा सार्वजनिक जीवन, प्रशासनिक अनुभव, शांत स्वभाव तथा दृढ़ विश्वास हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। विशेष रूप से जमीनी स्तर पर कार्यरत महिला जनप्रतिनिधियों के लिए वह एक आदर्श एवं रोल मॉडल हैं।
उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन पीठासीन अधिकारियों के मध्य जीवंत संवाद का एक प्रभावी मंच है। यद्यपि यह आयोजन वर्ष में एक बार होता है, तथापि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन में हाल के वर्षों में संसदीय विषयों पर निर्णय, संवाद एवं विचार-विमर्श के अधिक अवसर प्राप्त हुए हैं।
सम्मेलन में उत्तर प्रदेश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत तथा समग्र विकास पर आधारित एक लघु फिल्म प्रदर्शित की गई। साथ ही पुस्तक “उत्तर प्रदेश विधान सभा की संसदीय पद्धति और प्रक्रिया” का विमोचन भी किया गया।
अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधानसभा सतीश महाना ने स्वागत भाषण दिया। सभापति, विधान परिषद उत्तर प्रदेश, कुंवर मानवेन्द्र सिंह द्वारा धन्यवाद भाषण प्रस्तुत किया गया। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने भी सम्मेलन को संबोधित किया।
इस अवसर पर देश के सभी राज्य विधान सभाओं के अध्यक्षगण, विधान परिषदों के सभापति एवं अन्य पीठासीन अधिकारी, उत्तर प्रदेश के मंत्रिगण, सांसदगण, विधायकगण, राज्य सभा एवं लोक सभा के महासचिवगण, विधान परिषद के सचिवगण एवं अधिकारीगण सहित अनेक गणमान्य अतिथि एवं जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।

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