भातखण्डे की ध्रुपद कार्यशाला का तृतीय दिवस सम्पन्न

Third day of Bhatkhande's Dhrupad workshop concludes

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Lucknow, 28 Feb, 2026 03:08 AM
भातखण्डे की ध्रुपद कार्यशाला का तृतीय दिवस सम्पन्न

लखनऊ, (IPN)। भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, लखनऊ में पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे पीठ के अंतर्गत गायन विभाग द्वारा आयोजित ध्रुपद कार्यशाला का तृतीय दिवस अत्यंत उत्साहपूर्ण, ज्ञानवर्धक एवं सृजनात्मक वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यशाला के तृतीय दिवस प्रारंभ के अवसर पर विश्वविद्यालय की गायन विभागाध्यक्ष प्रो० सृष्टि माथुर, विभागाध्यक्ष तालवाद्य डॉ0 मनोज कुमार मिश्र तथा सहायक आचार्य (नृत्य) डॉ० रुचि खरे के साथ गायन विभाग के शिक्षकगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। 

कार्यशाला के तृतीय दिवस पर विशेषज्ञ विदुषी प्रो० मधु भट्ट तैलंग ने विद्यार्थियों को ध्रुपद गायन की परम्परागत साधना के अंतर्गत आलाप विस्तार के प्रशिक्षण की क्रमिक प्रक्रिया के विषय में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने आलाप के क्रम को स्पष्ट करते हुए तीव्र मध्य से आलाप-अभ्यास का प्रारम्भ कराया तथा ध्रुपद आलाप में प्रयुक्त होने वाले विविध तत्वों जैसे गमक, वेद, संचारी आदि की विस्तृत व्याख्या करते हुए उनका सप्रयोग अभ्यास भी कराया।

उन्होंने बताया कि ध्रुपद साधना में स्वर की शुद्धता, लय की दृढ़ता तथा क्रमबद्ध आलाप-विस्तार का विशेष महत्व होता है। इस प्रशिक्षण सत्र में गायन विभाग के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को इन सभी पहलुओं का गहन अभ्यास कराया गया, जो उनके लिए अत्यंत उपयोगी एवं ज्ञानवर्धक सिद्ध हुआ।

तत्पश्चात उन्होंने राग मालकौंस की चौताल निबद्ध रचना तथा द्रुत ताल निबद्ध बंदिश के माध्यम से विभिन्न महत्त्वपूर्ण अंशों का अभ्यास कराया। इसके साथ ही आलाप के विभिन्न जोड़ का परिचय देते हुए पूर्ण आलाप की गायन प्रक्रिया का विस्तृत प्रशिक्षण प्रदान किया, जिससे विद्यार्थियों के ज्ञान एवं व्यावहारिक समझ में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो० मांडवी सिंह ने बताया कि ध्रुपद भारतीय शास्त्रीय संगीत की मूलभूत और प्राचीन परम्पराओं में से एक है, जो हमारी सांगीतिक संस्कृति की गहराई और आध्यात्मिकता को अभिव्यक्त करती है। उन्होंने कहा कि ध्रुपद विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का हिस्सा भी है जिससे इस प्रकार की कार्यशालाएँ विद्यार्थियों को पारम्परिक संगीत साधना के अनुशासन, सौन्दर्य और उसकी विशिष्ट प्रस्तुति शैली से परिचित कराने का महत्वपूर्ण माध्यम बनती हैं। ऐसे आयोजनों से विद्यार्थियों को संगीत के सैद्धान्तिक ज्ञान के साथ-साथ उसके व्यावहारिक पक्षों को भी समझने का अवसर मिलता है।

विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ० सृष्टि धवन ने बताया कि विश्वविद्यालय निरंतर ऐसी शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करता है, जो विद्यार्थियों के ज्ञान, कौशल और रचनात्मक अभिरुचि को विकसित करती हैं। उन्होंने कहा कि ध्रुपद जैसी शास्त्रीय परम्पराओं से विद्यार्थियों को जोड़ना हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और विश्वविद्यालय भविष्य में भी इस प्रकार के उपयोगी एवं प्रेरणादायक आयोजनों का आयोजन करता रहेगा।

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