इजराइल के समर्थन एवं सहयोग की समाजवादी परंपरा

नेहरू- इंदिरा गांधी- राजीव गांधी की इजरायल नीति भारत के राष्ट्रहित की अवहेलना करते हुए अरब हुक्मरानों से व्यक्तिगत रिश्तों को तरजीह देने की थी। वैचारिक स्तर पर भी एक सैद्धांतिक जड़ता एवं थोथा आदर्शवाद परिलक्षित होता है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने 13 जून 1947 को पत्र लिखकर नेहरू से इजरायल के गठन एवं अंतरराष्ट्रीय मान्यता में सक्रिय सहयोग मांगा था। लोकतांत्रिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के एक मुकम्मल नेता माने जाने वाले नेहरू ने समकालीन विश्व के महानतम वैज्ञानिक आइंस्टीन के प्रस्ताव को गांधी की फिलिस्तीन नीति एवं अपने अरब प्रेम के चलते ठुकरा दिया।

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Lucknow, 14 Mar, 2026 06:59 PM
इजराइल के समर्थन एवं सहयोग की समाजवादी परंपरा

जय प्रकाश पांडेय

आईपीएन। इजरायल-अमेरिका और ईरान के मध्य अट्ठाइस फरवरी से चल रहे मौजूदा भीषण युद्ध में मोदी सरकार ने राष्ट्रहित के आधार पर बेहतरीन राजनयिक कौशल प्रदर्शित किया है। लेकिन युद्ध में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनई की मौत से क्षुब्ध होकर सड़क पर मातम मना रहे मुस्लिम अल्पसंख्यकों एवं प्रतिपक्षी दलों - कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, वामपंथी दलों आदि ने भारत सरकार पर इजरायल परस्त होने का आरोप लगाया है। एक ओर कांग्रेस की शीर्ष नेता सोनिया गांधी ने इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं दूसरी ओर समाजवादी पृष्ठभूमि वाले राजनीतिक दलों ने भी प्रधानमंत्री मोदी की हालिया इजरायल यात्रा एवं युद्ध में इजरायल के परोक्ष समर्थन को हमारी परंपरा के खिलाफ बताया है। ऐसे में भारतीय समाजवादियों की इजराइल के पैरोकारी की तारीख जानना बेहद जरूरी हो जाता है। भारत के सोशलिस्टों ने इजराइल के गठन (1948) से ही उसका समर्थन शुरू कर दिया।संविधान सभा की बहसों में फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता हरि विष्णु कामथ जो बाद में जेबी कृपलानी के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक बने, उन्होंने मार्च 1949 में कई बार इजरायल के साथ राजनयिक संबंध एवं सहयोग का मुद्दा उठाया। लेकिन पंडित नेहरू ने महात्मा गांधी के समय से फिलिस्तीन के साथ सहयोग की नीति का उल्लेख करते हुए हर बार इस सुझाव को खारिज कर दिया। हमारे देश का समूचा सोशलिस्ट नेतृत्व- जे पी नारायण, जीबी कृपलानी, डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, अशोक मेहता, एन जी गोरे, प्रेम भसीन, कर्पूरी ठाकुर, जार्ज फर्नांडीज, मधु दंडवते, सुरेंद्र मोहन, अनुसूया लिमिए, कमला सिन्हा आदि ने जायनिस्ट रिजीम की मेजबानी स्वीकार की।वहां प्रवास करते हुए इन सभी नेताओं ने भारत सहित समूचे विश्व से इजरायल के साथ राजनयिक एवं दोस्ताना संबंध स्थापित करने की अपील की। भारतीय समाजवादियों ने सोशलिस्ट इंटरनेशनल के मंच पर अपनी सक्रियता एवं प्रभाव का उपयोग भी इजराइल के राजनयिक समर्थन के लिए किया।

                   डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने पहले समाजवादी नेता के रूप में सन 1955 में इजरायल का दौरा किया। उन्होंने इजरायली जनता की युद्धप्रियता एवं उनकी विलक्षण प्रतिभा की प्रशंसा की। लोहिया ने अपनी पुस्तक 'फ्रेगमेंट्स आफ ए वर्ल्ड माइंड' में लिखा है कि 'अगर दुनिया में कहीं अंतिम व्यक्ति तक युद्ध करने जैसी भावना मुझे दिखी तो वह इजराइल में ही दिखी।' उन्होंने अपनी यात्रा के संस्मरण में बताया कि जब मैंने एक उत्साही नौजवान से पूछा कि भविष्य में एक दिन जब अरबों के पास इजराइल जैसी उच्च गुणवत्ता और उतनी ही संख्या में हथियार आ जाएंगे तो बीस लाख की आबादी वाले यहूदी आठ करोड़ अरब शत्रुओं के समक्ष कैसे टिक सकेंगे? उस नौजवान के उत्तर ने लोहिया को विस्मय में डाल दिया। उस यहूदी युवा ने कहा कि "हमारे लिए कहीं और जाने की कोई जगह नहीं है।" इसराइल के मानव संसाधन को बेहतरीन मानते हुए उन्होंने कहा कि इजराइल एक एशियाई देश है जिसके पास श्रेष्ठतम प्रतिभाएं हैं। वह कृषि सहित जीवन की अन्य क्षेत्रों में नवप्रयोग कर रहा है। उसके साथ साझेदारी से शांति और पुनर्निर्माण में पूरी एशिया लाभान्वित होगी। जे पी नारायण ने सितंबर 1958 में इजरायल की यात्रा की। उन्होंने इजरायल के सामुदायिक कार्यक्रम- किबुत्ज' को नजदीक से देखा और उसकी ‌सराहना की। उन्होंने पूरी दुनिया से इजराइल के साथ राजनयिक एवं मैत्री संबंध कायम करने का आह्वान किया। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने संसद में जोरदार ढंग से इजरायल के साथ राजनयिक संबंध एवं सक्रिय सहयोग स्थापित करने के पक्ष में आवाज बुलंद की। प्रसोपा ने अक्टूबर 1966 के अपने चुनावी घोषणापत्र में इजरायल के साथ राजनयिक संबंध स्थापना का संकल्प घोषित किया। सोशलिस्ट इंटरनेशनल भारतीय समाजवादियों की इजरायली पैरोकारी का एक महत्वपूर्ण मंच था। इस संगठन ने शुरुआती वर्ष में ही इजरायली समाजवाद की सराहना में एक आधिकारिक पुस्तिका प्रकाशित की। प्रसिद्ध समाजवादी नेता जेबी कृपलानी ने इस पुस्तिका की प्रस्तावना लिखी। 1953 की स्टॉकहोम की सोशलिस्ट कांग्रेस में प्रसोपा के संयुक्त सचिव प्रेम भसीन शामिल हुए तो रोम एवं वियेना में सोशलिस्ट इंटरनेशनल की बैठकों में प्रसोपा के अध्यक्ष अशोक मेहता स्वयं शामिल हुए। प्रथम एशियाई समाजवादी सम्मेलन 1953 में रंगून में आयोजित हुआ, जिसमें भारतीय समाजवादियों की भूमिका निर्णायक थी। यहां भी इजरायल के हक में आवाज बुलंद की गई। दूसरे एशियाई सोशलिस्ट सम्मेलन की मेजबानी प्रसोपा के रजत जयंती सम्मेलन- मुंबई में की गई। इजरायली प्रतिनिधिमंडल में भूतपूर्व प्रधानमंत्री एवं मौजूदा विदेश मंत्री मोशे शेरेट ने शिरकत की। इस सम्मेलन में भाषण देते हुए जे पी नारायण ने शेरेट की सराहना की और इजरायल से राजनयिक संबंध स्थापित करने पर बल दिया।

                  तृतीय अरब- इजरायल युद्ध(1967)जो 'छ: दिवसीय युद्ध' के नाम से प्रसिद्ध है। इजराइल ने इस युद्ध में मिस्र, सीरिया एवं जॉर्डन गठबंधन पर निर्णायक विजय हासिल की‌। विजेता इजरायल ने शत्रु राष्ट्रों के बड़े भूभाग- गाजा पट्टी, सिनाई प्रायद्वीप, वेस्ट बैंक, पूर्वी जेरूसलम एवं गोलान हाइट पर कब्जा भी कर लिया। युद्धरत इजरायल के समर्थन के लिए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता जार्ज फर्नांडीज ने "फ्रेंड्स ऑफ इजराइल" नामक संगठन बनाकर जनमत तैयार किया। फर्नांडीज के इजरायली पैरोकारी के बयान अखबारों में प्रमुखता से छपे। डॉ लोहिया द्वारा संपादित पत्रिकाओं 'जन' एवं 'मैनकाइंड' के जून 1967 अंक में भी फर्नाडीज के बयान प्रमुखता से प्रकाशित हुए। इस संदर्भ में डॉक्टर लोहिया का एक रोचक पत्राचार भी चर्चित हुआ। लोहिया के अच्छे मित्र फैजाबाद निवासी सिब्ते मोहम्मद नकवी ने 3 जुलाई 1967 को एक पत्र लिखकर 'जन' में फर्नांडीस के बयान के प्रकाशन पर गहरी नाराज़गी जताई। नकवी ने अपने पत्र में महात्मा गांधी के 26 नवंबर 1938 के 'हरिजन'में प्रकाशित लेख का जिक्र किया, जिसमें गांधी ने लिखा था कि- 'मेरी हमदर्दियां यहूदियों के साथ है। लेकिन यहूदियों के लिए कौमी देश बनाने की चीख पुकार में मेरे लिए कोई अपील नहीं है--- फिलिस्तीन अरबो की इसी तरह संपत्ति है, जैसे बरतानिया अंग्रेजों का और फ्रांस फ्रांसीसियों का। यहूदियों को अरबों पर लादना गलत है‌।' डॉक्टर लोहिया ने नकवी के खत के उत्तर में लिखा कि महात्मा गांधी हिंदू मुस्लिम के मामले में शायद थोड़ी मौकेबाजी कर गए। जब तुर्की के मुसलमान खिलाफत खत्म करके जम्हूरियत की स्थापना के लिए लड़ रहे थे। तब हिंदुस्तान के मुसलमान एवं गांधी के नेतृत्व में हिंदू भी खिलाफत की हिफाजत के लिए आंदोलन कर रहे थे। डॉक्टर लोहिया ने चेतावनी के लहजे में लिखा कि अगर ऐसी ही पुरानी बातें उठाते रहोगे तो फिर लोग कहना शुरू करेंगे कि ज्ञानवापी (वाराणसी) के पास मस्जिद को ठीक करके उसको पुरानी शक्ल में पहुंचाओ और मंदिर बनोओ क्योंकि आखिर वहां मंदिर ही था!

                नेहरू- इंदिरा गांधी- राजीव गांधी की इजरायल नीति भारत के राष्ट्रहित की अवहेलना करते हुए अरब हुक्मरानों से व्यक्तिगत रिश्तों को तरजीह देने की थी। वैचारिक स्तर पर भी एक सैद्धांतिक जड़ता एवं थोथा आदर्शवाद परिलक्षित होता है। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने 13 जून 1947 को पत्र लिखकर नेहरू से इजरायल के गठन एवं अंतरराष्ट्रीय मान्यता में सक्रिय सहयोग मांगा था। लोकतांत्रिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के एक मुकम्मल नेता माने जाने वाले नेहरू ने समकालीन विश्व के महानतम वैज्ञानिक आइंस्टीन के प्रस्ताव को गांधी की फिलिस्तीन नीति एवं अपने अरब प्रेम के चलते ठुकरा दिया। इजराइल के संदर्भ में नेहरू गुटनिरपेक्ष नीति की बहुप्रसिद्ध तटस्थता का भी अतिक्रमण कर फिलिस्तीन के हक में आक्रामक रणनीति अपनाई । नेहरू सरकार ने 1947 में फिलीस्तीन के विभाजन की योजना और संयुक्त राष्ट्र संघ में इजरायल के प्रवेश के खिलाफ मतदान भी किया। इंदिरा गांधी ने 1974 में फिलिस्तीन लिबरेशन आर्गेनाइजेशन को ही फिलिस्तीन के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मान्यता दी। पीएलओ के सर्वोच्च नेता यासिर अराफ़ात की भारत में इंदिरा सरकार ने मेजबानी की। अराफात से इंदिरा के बेहतर संबंध थे, वह सार्वजनिक रूप से इंदिरा गांधी को बहन कह कर संबोधित करते थे। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से फरवरी 1966 में जब इसराइल के राष्ट्रपति जल्मान शजर काठमांडू जाते हुए थोड़ी समय के लिए दिल्ली एवं कोलकाता में रुके थे। तब इंदिरा सरकार ने उन्हें राष्ट्रपति का सामान्य प्रोटोकॉल भी नहीं दिया। प्रसोपा एवं संसोपा के सांसदों ने लोकसभा में इस मुद्दे पर हंगामा किया। डॉ लोहिया ने सरकार के फैसले का विरोध करते हुए कहा कि जब भारत ने इसराइल को डिजुरे (कानूनी मान्यता) दे रखी है तो इजरायली राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल पर ऐसा रुख क्यों है? राजीव गांधी सरकार भी इंदिरा की नीति का अनुसरण करती रही। जबकि ऐतिहासिक सच्चाई यह है कि आतंकवाद की तरफदार अतिवादी इस्लामिक ताकतें दोनों देशों की साझी शत्रु हैं। हिंदू और यहूदी दोनों का सामूहिक नरसंहार विश्व में सर्वाधिक हुआ है। दमन, अत्याचार एवं नरसंहार के तारीखी ज़ख्म भी दोनों देशों के साझे हैं। इसलिए दोनों देश दर्द के रिश्ते से भी जुड़ते हैं। 

               राष्ट्रीय प्रतिरक्षा की दृष्टि से 1948, 1962,1965, 1971 में युद्ध का दंश झेल चुके भारत को इजरायल के साथ मित्रता एक सामरिक आवश्यकता थी। खुफिया सूचना, नवीनतम सैन्य प्रौद्योगिकी एवं मारक क्षमता वाले अत्याधुनिक शस्त्र के लिए इजरायल अधिक उपयोगी था। इसीलिए राष्ट्रवादी विचारक एवं सरसंघचालक गोलवलकर ने यहूदी राष्ट्रवाद की प्रशंसा करते हुए कहा कि "फिलिस्तीन यहूदी लोगों का प्राकृतिक क्षेत्र है जो राष्ट्रीयता की उनकी आकांक्षा के लिए आवश्यक है।" हिंदू महासभा के बहुचर्चित नेता वीडी सावरकर ने नैतिक और राजनीतिक दोनों आधारों पर इजरायल का समर्थन किया। जनसंघ के प्रखर चिंतक एवं नेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने भी भारत- इजराइल मैत्री की पक्षधरता प्रदर्शित की। जनसंघ ने भारत इजराइल रिश्ते को नगरिक स्तर पर सहभागिता बढ़ाने के आग्रह से जनसंघ एवं इजराइली कार्यकर्ताओं का साझा प्रशिक्षण शिविर का इजरायल में संचालन कराया। बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात एवं राष्ट्रहित के दबाव में अंततः पी वी नरसिम्हा राव ने 1992 में इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किया, जिससे नई दिल्ली और तेलअबीब में दोनों देशों के दूतावास स्थापित हुए। मोदी सरकार ने विदेश नीति को आदर्श एवं कल्पनाओं के स्वप्नलोक से हटाकर राष्ट्रहित की खुरदुरी जमीन पर स्थापित किया है। आज तेजी से बदलते हुए विश्व परिदृश्य में भारतीय विदेश नीति का कौशल दुनिया के लिए आश्चर्य का विषय है। युद्ध जैसे नैतिक उत्साह से लवरेज भारतीय कुटनीति 2026 में भी नई जमीन तोड़ने का क्रम जारी रखती है। गणतंत्र दिवस के अगले दिन- 27 जनवरी को भारत- यूरोपीय संघ के 16वें शिखर सम्मेलन में "भारत- यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते" ने इतिहास का एक नया अध्याय लिपिबद्ध किया। इस मुक्त व्यापार समझौते को 'मदर ऑफ ऑल डील' की संज्ञा दी जा रही है। ध्यातव्य है कि वैश्विक स्तर पर भारत का यह 22वां मुक्त व्यापार समझौता है। 27 देशों की यूरोपीय यूनियन और भारत का यह मुक्त व्यापार समझौता ग्लोबल जीडीपी के 25% हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। लोकतांत्रिक संस्कृति के प्रसार एवं संरक्षण पर भी भारत-यूरोपीय यूनियन की घनिष्ठता का असर दिखेगा। 

                भारतीय कूटनीति के समकालीन आवेग एवं युद्ध जैसे उत्साह की झलक भारत इजराइल संबंधों पर भी दिखती है। भारत- इजराइल द्विपक्षीय संबंधों को अधिक गहराई और मजबूती देने के लिए आज से नौ साल पहले नरेंद्र मोदी ने किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की प्रथम इजरायल यात्रा करके इतिहास लिखा था। इजरायल- अमेरिका और ईरान की मौजूदा जंग से पूर्व नरेंद्र मोदी के हालिया इजरायली दौरे में दोनों देशों के मध्य कुल 'सत्रह समझौते' संपन्न हुए। इन समझौतों में संयुक्त विकास, संयुक्त उत्पादन एवं तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर सहमति हुई। उच्च प्रौद्योगिकी के स्तर पर एआई, क्वांटम, क्रिटिकल मिनरल एवं सिविल न्यूक्लियर एनर्जी आदि में तकनीकी साझेदारी का दूरगामी प्रभाव होगा। इजरायली संसद को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा कि हम आज भी इजरायल के साथ हैं और भविष्य में भी इजरायल के साथ खड़े रहेंगे। कांग्रेस सरकारें इजरायल और अरब को परस्पर विरोधी ध्रुव मानकर चलती थी। इसकी विपरीत मोदी सरकार इजराइल से घनिष्ठ संबंधों के साथ-साथ देश की ऊर्जा आवश्यकताओं एवं खाड़ी देशों, मध्य पूर्व एशिया और पश्चिम एशिया में भारतीय प्रवासियों के हित को ध्यान में रखकर यूएई, खाड़ी के अधिकांश देशों एवं सऊदी अरब से भी अच्छे संबंध कायम किए है। प्रधानमंत्री मोदी अपने करिश्माई नेतृत्व के बूते कांग्रेस सरकारों में बहुप्रचारित परस्पर विरोधी दो ध्रुवों-'अरब और इजराइल'- को भारत के राष्ट्रहित रुपी नौका की दो पतवारें बनाने में सफलता हासिल की है। आज भारत- इजराइल का संबंध अस्त्र-शस्त्र निर्माण की साझी परियोजनाओं की स्थापना एवं खुफिया सूचनाओं को साझा करने के व्यापक तंत्र निर्माण की दिशा में बढ़ रहा है। मोदी सरकार की इजरायल नीति के मूल में भारत की समृद्धि, राष्ट्रीय प्रतिरक्षा एवं क्षेत्रीय शांति है। वैचारिक स्तर पर मोदी सरकार की इजराइल नीति भारत में भारतीयता के पहरेदार एवं सामाजिक न्याय के महान नायकों- जे पी नारायण, डॉक्टर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर एवं जॉर्ज फर्नांडीस के सपनों से प्रेरित है। इन महानायकों के विजन को तथा इनके सपनों को मूर्त रूप देने में मोदी सरकार ऐतिहासिक सफलता की ओर अग्रसर है।

( उपर्युक्त लेख वरिष्ठ लेखक जय प्रकाश पाण्डेय के निजी विचार हैं। आवश्यक नहीं है कि इन विचारों से आईपीएन भी सहमत हो। )

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