भारत के मन का संगीत हैं श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण को अतीत में देखना अच्छा नहीं लगता। वे इतिहास पुरूष हैं लेकिन वे वर्तमान में भी हैं। सतत् प्रवाह अन्तहीन। दिग्दिगन्त् और अनंत। इतिहास के पास हृदय नहीं होता। श्रीकृष्ण हृदय में ही खिलते हहराते हैं। कुछ दुराग्रही लोगों के तर्क हैं-कि श्रीकृष्ण काव्य कल्पना हैं कि वे इतिहास के पात्र हैं नहीं। तर्क का क्या? न प्रेम, न भाव विहवलता। न काव्य न संगीत। श्रीकृष्ण को आत्मसात करने के लिए प्रेम का आकाश चाहिए। इतिहास के पृष्ठ नहीं। वे इतिहास में नहीं समाते। इतिहास गढ़ते हैं और उसका अतिक्रमण भी करते हैं। श्रीकृष्ण सर्वत्र हैं।

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Lucknow, 17 Aug, 2025 03:32 PMहृदयनारायण दीक्षित
आईपीएन। श्रीकृष्ण भारत के मन का संगीत हैं। सामान्य संसारी। शिशु से बालक हुए। फिर अरुण तरुण युवा। उन्होंने चेतना की चरम ऊंचाई प्राप्त की। वे परम हो गए। शिशु रहे तो शिशु के रूप में पूर्ण। तमाम खेल खेले। खेलना भी दिव्य। तरूण हुए तो नाचे। उनका नृत्यरास महारास हो गया। बांसुरी बजाई तो उसकी धुन पर सब मस्त। प्रौढ़ हुए तो दर्शन दिग्दर्शन की पूर्णता गीता। कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें संपूर्ण अवतार कहा और उनके सभी कार्यों को लीला। महाभारत युद्ध में मित्र अर्जुन का साथ निभाया। सारथि बने। रथ हाँका। युद्धभूमि पर उसे विषाद हुआ। उन्होंने विश्वदर्शन का सार गीता उड़ेल दिया। वे अपने जीवन में ही पुराण पुरूष हो गए। उन्हें ईश्वर, भगवान और परमसत्ता जाना गया।
श्रीकृष्ण इतिहास से बड़े हैं। पुराणों का भी अतिक्रमण करते हैं। ये इतिहास होकर भी भूत नहीं। वे प्रतिपल सतत् प्रवाहमान प्रेम छन्द हैं। सुदूर अतीत से लेकर अद्यतन संगीतमय। वे भविष्य में भी हैं। जो हो चुका है, वहाँ। जो आज प्रतिपल प्रत्यक्ष है यहाँ। जो आगे होगा वहां। श्रीकृष्ण हम सबकी संभावना हैं। संभवामि युगे युगे वैयक्तिक घोषणा नहीं हैं। प्रकृति का हर एक अणु नृत्य मगन है। यह नृत्य उसी परम-चरम की रासलीला है।
दुनिया की सभी सभ्यताओं में देवता हैं। लेकिन नाचता हुआ श्रीकृष्ण जैसा देवता अन्यत्र दुर्लभ है। नाचने वाला यह देवता प्रेमरस से भरता है पूरी प्रकृति को। प्रकृति के भीतर होता है, प्रकृति का आच्छादन करता है। डंके की चोट पर युद्धभूमि में खड़े होकर अर्जुन से कहता है, ”यह प्रकृति मेरी ही अध्यक्षता में काम करती है अर्जुन।” जगत् गतिशील है। इसीलिए जीवन जगत् भी एक परिपूर्ण नृत्य है।
श्रीकृष्ण को अतीत में देखना अच्छा नहीं लगता। वे इतिहास पुरूष हैं लेकिन वे वर्तमान में भी हैं। सतत् प्रवाह अन्तहीन। दिग्दिगन्त् और अनंत। इतिहास के पास हृदय नहीं होता। श्रीकृष्ण हृदय में ही खिलते हहराते हैं। कुछ दुराग्रही लोगों के तर्क हैं-कि श्रीकृष्ण काव्य कल्पना हैं कि वे इतिहास के पात्र हैं नहीं। तर्क का क्या? न प्रेम, न भाव विहवलता। न काव्य न संगीत। श्रीकृष्ण को आत्मसात करने के लिए प्रेम का आकाश चाहिए। इतिहास के पृष्ठ नहीं। वे इतिहास में नहीं समाते। इतिहास गढ़ते हैं और उसका अतिक्रमण भी करते हैं। श्रीकृष्ण सर्वत्र हैं। इठलाती ऊषा में, अरुण तरुण सूर्य की रश्मियों में, नदी के छन्दस् नाद में, गौओं के चलने से उड़ी धूलि की महक में श्रीकृष्ण ही श्रीकृष्ण हैं। सावन के मेघ या भादौं की रात में चमकती विद्युत दीप्ति में वही हैं।
कृष्ण आकांक्षा रहित परम वैभव हैं। संग और असंग का असंभव संग। कृष्ण दर्शन का मुख्य सूत्र है अनासक्ति। राग का भरपूर आस्वाद लेकिन राग से विराग। रसपूर्ण जीना लेकिन रस आसक्ति से दूरी। कर्म अभ्यास में डूबना लेकिन वैराग्य में रहना अभ्यासेन वैराग्येण च। जीवन के सभी अवसरों पर संग-संग प्रति प्रसंग असंग गति। युद्ध में पूरे मन से सम्मिलित रहना लेकिन युद्ध नहीं करना। कृष्ण ने राज्य और राजनीति में जमकर हस्तक्षेप किया लेकिन राजसत्ता से दूर रहे। साधारण किसान की तरह गोपाल बने। असाधारण कलाकार की तरह मुरलीधर। हथियार भी असाधारण ही रखा। सुदर्शन चक्र।
श्रीकृष्ण संपूर्ण रसों के महारस हैं। मधुरस, नृत्यरत भगवत्ता। साधना रहित सिद्धि। निष्काम कामना। इच्छारहित अभिलाषा। जीवन के हरेक रंग और आयाम में उनकी उपस्थिति है। वे रूप, रंग, हाव, भाव और गतिशीलता में सुदर्शन हैं। सभी लोकों के मनमोहन। श्रीकृष्ण का सुदर्शन गतिशील चक्र भी है। कालनियंता है इस चक्र का। काल में जन्म है और काल में ही तरुणाई। काल में ज्ञान है और काल के अतिक्रमण में मुक्ति। सुदर्शन चक्र में दर्शन के साथ कालबोध भी है। यह चक्र घूम रहा है। बारंबार। सृष्टि चक्र चल रहा है। बताते हैं, ”ऐसा कोई समय नहीं था अर्जुन। जब हम या तुम नहीं थे। हमारा तुम्हारा यहाँ बार-बार आना जाना हुआ है। मैं यह बात जानता हूँ लेकिन तुम नहीं जानते।”
श्रीकृष्ण से जुड़े स्थान, नदीनाम और नगर क्षेत्र प्रत्यक्ष हैं, लेकिन वामपंथी विद्वान उन्हें इतिहास पुरूष नहीं मानते। वे श्रीकृष्ण को महाभारत के रचनाकार कवि की कल्पना मानते हैं। महाभारत वस्तुतः इतिहास है, काव्य तो है ही। श्रीकृष्ण की जन्मतिथि 18 जुलाई सन् 3228 ईसा पूर्व बताई जाती है। श्रीकृष्ण 3228-3102 ई० पूर्व हैं। महाभारत युद्ध संभवतः 3138 ई० पूर्व हुआ था। उन्होंने इसी युद्ध के प्रारम्भ में अर्जुन को गीता का प्रबोधन दिया था। भारत का उपनिषद् प्रवचन हले का है। ऋग्वेद में अनेक ‘जनों‘ के उल्लेख हैं लकिन पांच जनों की चर्चा ज्यादा है। इन पांच में एक चर्चित गण ‘यदु‘ है। श्रीकृष्ण इसी समूह से सम्बंधित थे। इनके कुल का नाम था वृष्णि। महाभारत आदि पर्व में उन्हें ‘वृष्णि प्रवीर‘ और पान्डवों को ‘कुरू प्रवीर‘ बताया गया है। यदु शाखा में वृष्णि के अलावा अंधक और भोज भी प्रतिष्ठित कुल थे। महाभारत (उद्योग पर्व) के अनुसार सैकड़ो वृष्णि, अंधक और भोज लेकर कृष्ण बलराम द्वारिका की ओर गये थे। कृष्ण-बलराम इस समूह में अपनी नेतृत्व क्षमता के कारण प्रमुख हैं, लेकिन वे राजा नहीं हैं। श्रीकृष्ण की भूमिका प्रमुख नेता की है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर ‘कृष्ण सर्किट‘ विकास पहल में पाँच राज्य और लगभग 12 प्रमुख तीर्थ स्थल शामिल हैं। गुजरात के द्वारका, राजस्थान के नाथद्वारा, जयपुर, सीकर, हरियाणा के कुरुक्षेत्र, उत्तर प्रदेश में मथुरा, वृंदावन, गोकुल, बरसाना, नंदगांव, गोवर्धन, ओडिशा में पुरी आदि स्थलों में श्रीकृष्ण से जुड़ी धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व की विरासतों को विकसित किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में मथुरा को हेरिटेज सिटी के रूप में मान्यता मिली है। मथुरा का सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से संवर्धन हुआ है। भाजपा-शासित राज्य सरकारें श्रीकृष्ण से जुड़ी सांस्कृतिक विरासतों को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय हैं।
मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने ‘श्रीकृष्ण पथ योजना‘ घोषित की। जिसके तहत मध्य प्रदेश में करिला धाम जैसे कृष्ण से जुड़े स्थानों को तीर्थ स्थल के रूप में विकसित करने के लिए धनराशि जारी हुई। गोवर्धन पूजा, गीता जयंती, जनमाष्टमी जैसी तिथियों पर राज्य स्तरीय आयोजन सुनिश्चित किए गए। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ज्योतिसर, कुरुक्षेत्र जहां श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया था, को धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने की घोषणा की है। ज्योतिसर को विश्व-स्तरीय गंतव्य बनाने का प्रयास जारी है।
श्रीकृष्ण परिपूर्णता हैं। प्रकृति की चरम संभावना। अर्जुन को विषाद हुआ। उड़ेल दिया ज्ञान। संशय नहीं मिटा तो दिखा दिया विश्वरूप। विश्व प्रत्यक्ष है। हम विश्वदर्शन में रस नहीं लेते। सूर्याेदय का दर्शन नहीं करते। हवाएं सहलाती आती हैं, हम उन्हें धन्यवाद भी नहीं देते। हमारे आपके सबके भीतर भी है विश्वरूप। श्रीकृष्ण जैसा मित्र मिले या अर्जुन जैसे विषादी जिज्ञासु हो हम सब। तो बन सकती है बात। श्रीकृष्ण ऐसी ही संभावना हैं। नाचते हुए दर्शन के रसपूर्ण प्रतीक। नटखट, मनमोहन और बिन्दास रसिया। उस नटखट रसिया को नमस्कार।
( लेखक हृदयनारायण दीक्षित भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं यूपी विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं। उपर्युक्त लेख लेखक के निजी विचार हैं। आवश्यक नहीं है कि इन विचारों से आईपीएन भी सहमत हो। )
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